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Monday, 30 October 2017

गीता ( अनमोल वचन )

गीता ( अनमोल वचन )



1 :- नर्क के तीन द्वार हैं  -  1 - वासना
                                         2 -  क्रोध
                                         3 - लालच

2 :- अगर आप अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में असफल हो जाते हैं , तो अपनी रणनीति बदलिए , न की लक्ष्य।

3 :- क्रोध से भ्रम पैदा होता है भ्रम से बुद्धि व्यग्र होती है जब बुद्धि व्यग्र होती है तब तर्क नष्ट हो जाता है जब नर्क नष्ट होता है तब व्यक्ति का पतन हो जाता है।

4 :- ऐसा कोई नहीं , जिसने भी इस संसार में अच्छा कर्म किया हो और उसका बुरा अंत हुआ हो , चाहे इस काल में हो या आने वाले काल में।

5 :- फल की अभिलाषा छोड़ कर , कर्म करने वाला पुरुष ही अपने जीवन को सफल बनाता है।

6 :- मन अशांत है और उसे नियंत्रित करना कठिन है , लेकिन अभ्यास से इसे वश में किया जा सकता है।

7 :- अपने कर्म पर अपना दिल लगाएं , न की उसके फल पर।

8 :- वह जो मृत्यु के समय मुझे स्मरण करते हुए अपना शरीर त्यागता है , वह मेरे धाम को प्राप्त होता है , इसमें कोई संशय नहीं है।

 9 :- किसी दूसरे के जीवन के साथ , पूर्ण रूप से जीने से अच्छा है , कि हम अपने स्वंय के भाग्य के अनुसार अपूर्ण जिए।

 10 :- जो मन को नियंत्रित नहीं करते , उनके लिए वह शत्रु के समान करता है।

11 :- एक उपहार तभी अच्छा और पवित्र लगता है , जब वह दिल से किसी सही व्यक्ति को सही समय और सही जगह पर दिया जाये , और जब उपहार देने वाला व्यक्ति का दिल उस उपहार के बदले , कुछ पाने की उम्मीद ना रखता।

12 :- आत्म - ज्ञान की तलवार से काटकर , अपने ह्यदय से अज्ञान के संदेह को अलग कर दो , अनुशाषित रो,             उठो।
13 :- मनुष्य अपने विश्वास से निर्मित होता है , जैसा वो विश्वास करता है वैसा वो बन जाता है।

14 :-  जो कोई भी जिस किसी को भी देवता की पूजा , विश्वास के साथ करने की इच्छा रखता है , मैं  उसका           विश्वास उसी देवता में दृण कर देता हूँ।

15 :- लोग अपने अपमान के बारे में हमेशा  बात करेंगे , सम्मानित व्यक्ति के लिए अपमान मृत्यु से भी बदतर है।
16 :- हम जो देखते हैं , और हम जो हैं हम उसी वस्तु को निहारते हैं , इसलिए जीवन हमेशा अच्छी और                     सकारात्मक चीजों को देखें और सोचें।

17 :-  केवल मन ही , किसी का मित्र और शत्रु होता है।

18 :- जो चीज़ हमारे हाथ में नहीं है , उसके विषय में चिंता करके कोई फायदा नहीं।

19 :- हे अर्जुन , जब - जब संसार में धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है , तब -तब अच्छे लोगों की रक्षा        ,  दुष्टों का संहार, और धर्म की स्थापना करने के लिए , मैं  हर युग में अवतरित होता हूँ।

20 :- श्रेष्ट मनुष्य जैसा आचरण करता है , दूसरे लोग भी वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो प्रमाण देता है ,          जनसमुदाय उसी का अनुशरण करता है।

21 :- दुःख से जिसका मन परेशान नहीं होता ,सुख की जिसको आकांक्षा नहीं होती , तथा जिसके मन में राग ,            भय और क्रोध नष्ट हो गए हैं ,ऐसा मुनि आत्मज्ञानी कहलाता है।

22 :- जो ज्ञान और कर्म को एक रूप में देखता है , वही  सही मायने में देखता है।

23 :-  हर व्यक्ति का विश्वास उसकी प्रकृति के अनुसार होता है।

24 :- जन्म लेने वाले के लिए मृत्यु उतनी ही निश्चित है , जितना की मृत होने वाले के लिए जन्म लेना ,               इसलिए जो अपरिहार्य है उस पर शोक मत करो।

25 :- भगवान या परमात्मा की शांति उनके साथ होती है , जिसके मन और आत्मा में एकता हो , जो इच्छा           और  क्रोध से मुक्त हो , जो अपने खुद की आत्मा को सही मायने में जनता हो।

26 :- सभी अच्छे काम छोड़ कर बस भगवान में पूर्ण रूप से समर्पित हो जाओ , मैं  तुम्हे सभी पापों से मुक्त         कर  दूंगा , शोक मत करो।

27 :- किसी और का काम पूर्णता से करने से कहीं अच्छा है कि  अपना काम करें , भले ही उसे अपूर्णता से करना  पड़े।
28 :- प्रबुध्द व्यक्ति के लिए , गंदगी का ढेर , पत्थर और सोना , सभी समान हैं।

29 :- मैं सभी प्राणियों को सामान रूप से देखता हूँ , ना कोई मुझे काम प्रिय है ना अधिक , लेकिन जो मेरी                  प्रेमपूर्वक आराधना करते हैं , वो मेरे भीतर रहते हैं और मैं उनके।

30 :- प्रबुध्द व्यक्ति सिवाय ईश्वर के , किसी और पर निर्भर नहीं करता।

31 :- सन्निहित आत्मा का अस्तित्व अविनाशी और अनंत हैं , केवल भौतिक शरीर तथ्यात्मक रूप से ख़राब है         , इसलिए हे अर्जुन ! लड़ते रहो।

32 :- हे अर्जुन ! केवल भाग्यशाली योद्धा ही ऐसा युद्ध लड़ने का अवसर पाते हैं जो स्वर्ग के द्वार के सामान है। 

33 :- भगवान प्रत्येक वस्तु में है और सबके ऊपर भी। 

34 :- सदैव संदेह करने वाले व्यक्ति के लिए प्रसन्नता ना इस लोक में है ना ही कहीं और। 

35 :- आपके सार्वलौकिक रूप का मुझे न प्रारंभ न अंत दिखाई दे रहा है। 

36 :- सभी कार्य ध्यान से करो , करुणा द्वारा निर्देशित किये हुए। 

37 :-तुम उसके लिए शोक करते हो जो शोक करने के योग्य नहीं हैं ,  फिर भी ज्ञान की बातें करते हो ,            बुद्धिमान  व्यक्ति ना जीवित और ना  मृत व्यक्ति लिए शोक करते हैं। 

38  :- कभी ऐसा समय नहीं था जब मैं , तुम , राजा - महाराजा अस्तित्व में नहीं थे , ना ही भविष्य में कभी ऐसा होगा कि हमारा अस्तित्व समाप्त हो जाये। 

39  :- कर्म मुझे बांधता नहीं , क्योकि मुझे कर्म के प्रतिफल की कोई इच्छा नहीं। 

40  :- हे अर्जुन ! हम दोनों ने कई जन्म लिए हैं।  मुझे याद हैं , लेकिन तुम्हें  नहीं।

41  :- मन की गतिविधियों ,होश , श्वास और भावनाओं के माध्यम से भगवान की शक्ति सदा तुम्हारे साथ है , और लगातार तुम्हें बस एक साधन की तरह प्रयोग कर के सभी कार्य कर रही है। 

42  :- जो हमेशा मेरा स्मरण या एक - चित्त मन से मेरा पूजन करते हैं , मैं व्यक्तिगत रूप से उनके कल्याण का उत्तरदायित्व लेता हूँ। 

43  :- कर्म योग वास्तव में एक परम रहस्य है। 

44  :- इन्द्रियों की दुनिया में कल्पना  शुरुआत है , और अंत भी , दुःख को जन्म देता है। 

45  :- बुद्धिमान व्यक्ति को समाज कल्याण के लिए बिना आसक्ति के काम करना चाहिए। 

46  :- जो व्यक्ति आध्यात्मिक जागरूकता के शिखर पर पहुंच चुके हैं , उनका मार्ग है निःस्वार्थ कर्म , जो भगवान साथ संयोजित हो चुके हैं उनका मार्ग है स्थिरता और शांति। 

47 :- यद्यपि मै इस तंत्र का रचयिता हूँ , लेकिन सभी को यह ज्ञात होना चाहिए कि मैं कुछ नहीं करता और मैं अनंत हूँ। 

48  :- जब वे अपने कार्य में आनंद खोज लेते हैं तब वे पूर्णता प्राप्त करते हैं। 

49  :- वह जो सभी इच्छाएं त्याग देता है , मैं मेरा की लालसा और भावना से मुक्त जाता है उसे शांति प्राप्त होती है। 

50  :- मेरे लिए ना  कोई घृणित है ना प्रिय , किन्तु जो व्यक्ति भक्ति साथ मेरी पूजा  करते हैं , वो मेरे साथ हैं और मैं  भी उनके साथ हूँ। 

51  :- जो इस लोक में अपने काम की सफलता की कामना रखते हैं , वे देवताओं का पूजन करें। 

52  :- मैं  ऊष्मा देता हूँ , मई वर्षा करता हूँ , मई वर्षा रोकता भी हूँ ,मई अमरत्व भी हूँ , और मृत्यु भी मई ही हूँ। 

53  :- बुरे कर्म करने वाले , सबसे नीच व्यक्ति जो राक्षसी प्रवित्तियों से जुड़े हुए हैं ,  जिनकी बुद्धि माया ने हर ली  है , वो मेरी पूजा या मुझे पाने का प्रयास नहीं करते। 

54  :- वह जो इस ज्ञान में विश्वास नहीं रखते , मुझे प्राप्त बिना जन्म और मृत्यु के चक्र का अनुगमन करते हैं। 

55  :- हे अर्जुन ! मैं भूत , वर्तमान और भविष्य के सभी प्राणियों को जनता हूँ ,किन्तु वास्तविकता में कोई मुझे नहीं जनता। 

56  :- स्वर्ग प्राप्त करने और वहां कई वर्षों तक वास करने के पश्चात , एक असफल योगी का पुनः एक पवित्र और समृध्द कुटुंब में जन्म होता है। 

57  :- निर्माण केवल पहले से मौजूद चीजों का प्रक्षेपण है। 

58  :- मैं सभी प्राणियों के ह्रदय में विद्यमान हूँ। 

59  :- ऐसा कुछ भी नहीं , चेतन या अचेतन , जो मेरे बिना अस्तित्व में हो सकता हो। 

60  :- स्वार्थ से भरा कार्य इस दुनिया को कैद में रख देगा , अपने जीवन में स्वार्थ को दूर रखें , बिना किसी व्यक्तिगत लाभ के। 


   


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